श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 10: भाई के साथ वैर का कारण बताने के प्रसङ्ग में सुग्रीव का वाली को मनाने और वाली द्वारा अपने निष्कासित होने का वृत्तान्त सुनाना  »  श्लोक 27-28
 
 
श्लोक  4.10.27-28 
तेनाहमपविद्धश्च हृतदारश्च राघव।
तद्भयाच्च महीं सर्वां क्रान्तवान् सवनार्णवाम्॥ २७॥
ऋष्यमूकं गिरिवरं भार्याहरणदु:खित:।
प्रविष्टोऽस्मि दुराधर्षं वालिन: कारणान्तरे॥ २८॥
 
 
अनुवाद
'रघुनन्दन! उसने मुझे घर से निकाल ही नहीं दिया, अपितु मेरी पत्नी का भी हरण कर लिया। उसके भय से मैं वन और समुद्र सहित सारी पृथ्वी पर घूमता रहा। अन्त में पत्नी के हरण के दुःख से व्यथित होकर मैं इस महान पर्वत ऋष्यमूक पर आया; क्योंकि विशेष कारणवश बालि के लिए इस स्थान पर आक्रमण करना अत्यन्त कठिन है।॥ 27-28॥
 
‘Raghunandan! She not only threw me out of my house, but also took away my wife. Due to fear of her, I roamed all over the earth including forests and seas. Ultimately, I came to this great mountain Rishyamuk, distressed by the pain of being kidnapped from my wife; because due to a special reason, it is very difficult for Vali to attack this place.॥ 27-28॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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