vedamrit
Reset
Home
प्रमुख ग्रंथ
भगवद गीता
श्रीमद् रामायण
श्रीमद् भागवतम
श्री महाभारत
श्री रामचरितमानस
श्रीमद् विष्णु पुराण
श्रीचैतन्य भागवत
श्रीचैतन्य चरितामृत
भक्तिरसामृतसिन्धु
वैष्णव भजन, इस्कॉन आरती
Apps
About
Contact
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण
»
काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड
»
सर्ग 10: भाई के साथ वैर का कारण बताने के प्रसङ्ग में सुग्रीव का वाली को मनाने और वाली द्वारा अपने निष्कासित होने का वृत्तान्त सुनाना
»
श्लोक 25
श्लोक
4.10.25
तत्रानेनास्मि संरुद्धो राज्यं मृगयताऽऽत्मन:।
सुग्रीवेण नृशंसेन विस्मृत्य भ्रातृसौहृदम्॥ २५॥
अनुवाद
"यह सुग्रीव इतना क्रूर और निर्दयी है कि उसने भाईचारे का प्यार भूलकर पूरे राज्य पर कब्जा करने के लिए मुझे उस गुफा में बंद कर दिया।"
“This Sugreeva is so cruel and ruthless that he forgot brotherly love and locked me inside that cave to take over the entire kingdom.”
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
About Us
|
Contact Us
|
Privacy Policy
|
Connect Form
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2023 vedamrit.in - All Rights Reserved. Developed by ACd
Download SongBook App
Install
×