श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 10: भाई के साथ वैर का कारण बताने के प्रसङ्ग में सुग्रीव का वाली को मनाने और वाली द्वारा अपने निष्कासित होने का वृत्तान्त सुनाना  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  4.10.2 
दिष्टॺासि कुशली प्राप्तो निहतश्च त्वया रिपु:।
अनाथस्य हि मे नाथस्त्वमेकोऽनाथनन्दन॥ २॥
 
 
अनुवाद
मैंने कहा, "अनाथनंदन! यह सौभाग्य है कि आप सकुशल लौट आए और वह शत्रु आपके हाथों मारा गया। आपके बिना मैं अनाथ हो रहा था। अब आप ही मेरे एकमात्र स्वामी हैं।"
 
I said, 'Anathanandan! It is fortunate that you returned safely and that enemy was killed by your hands. I was becoming an orphan without you. Now you are my only master.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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