श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 10: भाई के साथ वैर का कारण बताने के प्रसङ्ग में सुग्रीव का वाली को मनाने और वाली द्वारा अपने निष्कासित होने का वृत्तान्त सुनाना  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  4.10.18 
अहत्वा नास्ति मे शक्ति: प्रतिगन्तुमित: पुरीम्।
बिलद्वारि प्रतीक्ष त्वं यावदेनं निहन्म्यहम्॥ १८॥
 
 
अनुवाद
"सुग्रीव! मैं इस शत्रु को मारे बिना किष्किन्धपुरी लौटने में असमर्थ हूँ; इसलिए जब तक मैं इस राक्षस को मारकर वापस न आऊँ, तब तक तुम इस गुफा के द्वार पर रहकर मेरी प्रतीक्षा करो।" ॥18॥
 
"Sugreeva! I am unable to return to Kishkindapuri without killing this enemy; therefore, until I return after killing this demon, you stay at the door of this cave and wait for me." ॥18॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd