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ramayan 4.1.108: लक्ष्मण! जिसने मुझे राज्य से वंचित और निराश होने पर भी नहीं छोड़ा, जो केवल मेरा ही अनुसरण करता रहा, उसके बिना मैं इस दयनीय स्थिति में कैसे जीवित रहूँगा?॥108॥   |   ramayan सर्ग 4.1: पम्पासरोवर के दर्शन से श्रीराम की व्याकुलता, दोनों भाइयों को ऋष्यमूक की ओर आते देख सुग्रीव तथा अन्य वानरों का भयभीत होना   ।   ramayan काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 1: पम्पासरोवर के दर्शन से श्रीराम की व्याकुलता, दोनों भाइयों को ऋष्यमूक की ओर आते देख सुग्रीव तथा अन्य वानरों का भयभीत होना  »  श्लोक 108
 
 
श्लोक  4.1.108 
तया विहीन: कृपण: कथं लक्ष्मण धारये।
या मामनुगता राज्याद् भ्रष्टं विहतचेतसम्॥ १०८॥
 
 
अनुवाद
लक्ष्मण! जिसने मुझे राज्य से वंचित और निराश होने पर भी नहीं छोड़ा, जो केवल मेरा ही अनुसरण करता रहा, उसके बिना मैं इस दयनीय स्थिति में कैसे जीवित रहूँगा?॥108॥
 
Lakshmana! The one who did not abandon me even when I was deprived of my kingdom and was in despair, who followed me only, how will I survive in this miserable condition without him?॥ 108॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)