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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 3: अरण्य काण्ड  »  सर्ग 9: सीता का श्रीराम से निरपराध प्राणियों को न मारने और अहिंसा-धर्म का पालन करने के लिये अनुरोध  »  श्लोक 24-25
 
 
श्लोक  3.9.24-25 
स्नेहाच्च बहुमानाच्च स्मारये त्वां तु शिक्षये।
न कथंचन सा कार्या गृहीतधनुषा त्वया॥ २४॥
बुद्धिर्वैरं विना हन्तुं राक्षसान् दण्डकाश्रितान्।
अपराधं विना हन्तुं लोको वीर न मंस्यते॥ २५॥
 
 
अनुवाद
'तुम्हारे प्रति मेरे प्रेम और अनन्य आदर के कारण मैं तुम्हें उस प्राचीन घटना का स्मरण कराता हूँ और यह भी शिक्षा देता हूँ कि बिना किसी शत्रुता के तुम धनुष उठाकर दण्डकारण्य के राक्षसों को मारने का विचार भी मत करो। वीर! संसार के लोग बिना किसी अपराध के किसी को मारना अच्छा नहीं समझेंगे।
 
‘Due to the love and special respect I have for you, I remind you of that ancient incident and also teach you that you should not take up the bow and think of killing the demons of Dandakaranya without any enmity. Brave one! The people of the world will not consider it good to kill someone without any crime.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)