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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 3: अरण्य काण्ड  »  सर्ग 72: श्रीराम और लक्ष्मण के द्वारा चिता की आग में कबन्ध का दाह तथा उसका दिव्य रूप में प्रकट होकर उन्हें सग्रीव से मित्रता करने के लिये कहना  »  श्लोक 23-24h
 
 
श्लोक  3.72.23-24h 
न तस्याविदितं लोके किंचिदस्ति हि राघव॥ २३॥
यावत् सूर्य: प्रतपति सहस्रांशु: परंतप।
 
 
अनुवाद
रघुनन्दन! शत्रुओं का नाश करने वाले! जहाँ तक सहस्र किरणों वाले सूर्यदेव की ज्योति है, वहाँ तक संसार का कोई भी स्थान या वस्तु सुग्रीव से अज्ञात नहीं है।
 
Raghunandan! Destroyer of enemies! As far as the Sun God with thousands of rays shines, there is no place or thing in the world that is unknown to Sugreev. 23 1/2.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)