vedamrit
Reset
Home
प्रमुख ग्रंथ
भगवद गीता
श्रीमद् रामायण
श्रीमद् भागवतम
श्री महाभारत
श्री रामचरितमानस
श्रीमद् विष्णु पुराण
श्रीचैतन्य भागवत
श्रीचैतन्य चरितामृत
भक्तिरसामृतसिन्धु
वैष्णव भजन, इस्कॉन आरती
Apps
About
Contact
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण
»
काण्ड 3: अरण्य काण्ड
»
सर्ग 72: श्रीराम और लक्ष्मण के द्वारा चिता की आग में कबन्ध का दाह तथा उसका दिव्य रूप में प्रकट होकर उन्हें सग्रीव से मित्रता करने के लिये कहना
»
श्लोक 2
श्लोक
3.72.2
लक्ष्मणस्तु महोल्काभिर्ज्वलिताभि: समन्तत:।
चितामादीपयामास सा प्रजज्वाल सर्वत:॥ २॥
अनुवाद
लक्ष्मण ने बड़ी-बड़ी लकड़ियाँ लेकर चिता को चारों ओर से जलाया; तब वह सब ओर से जलने लगी॥ 2॥
Lakshmana lit the pyre on all sides using large burning sticks; then it started blazing from all sides.॥ 2॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
About Us
|
Contact Us
|
Privacy Policy
|
Connect Form
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2023 vedamrit.in - All Rights Reserved. Developed by ACd
Download SongBook App
Install
×