श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 3: अरण्य काण्ड  »  सर्ग 72: श्रीराम और लक्ष्मण के द्वारा चिता की आग में कबन्ध का दाह तथा उसका दिव्य रूप में प्रकट होकर उन्हें सग्रीव से मित्रता करने के लिये कहना  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  3.72.17 
गच्छ शीघ्रमितो वीर सुग्रीवं तं महाबलम्।
वयस्यं तं कुरु क्षिप्रमितो गत्वाद्य राघव॥ १७॥
 
 
अनुवाद
हे वीर रघुनाथजी! आप शीघ्र ही यहाँ से महाबली सुग्रीव के पास जाकर उसे तुरन्त अपना मित्र बना लें॥ 17॥
 
Valiant Raghunathji! You should quickly go from here to the mighty Sugreeva and make him your friend immediately.॥ 17॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)