श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 3: अरण्य काण्ड  »  सर्ग 72: श्रीराम और लक्ष्मण के द्वारा चिता की आग में कबन्ध का दाह तथा उसका दिव्य रूप में प्रकट होकर उन्हें सग्रीव से मित्रता करने के लिये कहना  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  3.72.10 
तदवश्यं त्वया कार्य: स सुहृत् सुहृदां वर।
अकृत्वा नहि ते सिद्धिमहं पश्यामि चिन्तयन्॥ १०॥
 
 
अनुवाद
‘इसलिए हे मित्रश्रेष्ठ रघुनन्दन! तुम्हें उस व्यक्ति को अपना मित्र बनाना चाहिए जो तुम्हारे समान ही बुरी स्थिति में हो (इस प्रकार तुम्हें मित्र की शरण लेने की नीति अपनानी चाहिए)। बहुत विचार करने पर भी ऐसा किए बिना मुझे तुम्हारी सफलता नहीं दिखाई देती॥10॥
 
‘Therefore, O best of friends, Raghunandan! You must make that person your friend who is in a bad condition like you (in this way you should adopt the policy of taking shelter of a friend). Even after thinking a lot, I do not see your success without doing this.॥10॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)