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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 3: अरण्य काण्ड  »  सर्ग 71: कबन्ध की आत्मकथा, अपने शरीर का दाह हो जाने पर उसका श्रीराम को सीता के अन्वेषण में सहायता देने का आश्वासन  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  3.71.33 
तेन सख्यं च कर्तव्यं न्याय्यवृत्तेन राघव।
कल्पयिष्यति ते वीर साहाय्यं लघुविक्रम॥ ३३॥
 
 
अनुवाद
हे वीर रघुनाथजी, जो शीघ्र ही पराक्रम दिखाते हैं! आपको उस धर्मनिष्ठ महापुरुष से मित्रता करनी चाहिए। वह आपकी सहायता करेंगे।
 
O brave Raghunathji, who displays valour quickly! You should make friends with that great man of just conduct. He will help you.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)