श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 3: अरण्य काण्ड  »  सर्ग 71: कबन्ध की आत्मकथा, अपने शरीर का दाह हो जाने पर उसका श्रीराम को सीता के अन्वेषण में सहायता देने का आश्वासन  »  श्लोक 27-28
 
 
श्लोक  3.71.27-28 
दिव्यमस्ति न मे ज्ञानं नाभिजानामि मैथिलीम्॥ २७॥
यस्तां वक्ष्यति तं वक्ष्ये दग्ध: स्वं रूपमास्थित:।
योऽभिजानाति तद्रक्षस्तद् वक्ष्ये राम तत्परम्॥ २८॥
 
 
अनुवाद
श्री राम! इस समय मुझमें दिव्य ज्ञान नहीं है, इसलिए मैं मिथिला कुमारी के विषय में कुछ भी नहीं जानता। जब मेरा शरीर जल जाएगा, तब मैं अपना पूर्व रूप प्राप्त कर लूँगा और तुम्हें एक ऐसे व्यक्ति का पता बता सकूँगा जो तुम्हें सीता के विषय में कुछ बताएगा और साथ ही तुम्हें एक ऐसे व्यक्ति से भी परिचित करा दूँगा जो उस महादैत्य को जान लेगा॥ 27-28॥
 
Shri Ram! At this time I do not have divine knowledge, therefore I do not know anything about Mithila Kumari. When my body is burnt, then I will regain my previous form and will be able to tell you the address of a person who will tell you something about Sita and will also introduce you to a person who will know that great demon.॥ 27-28॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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