श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 3: अरण्य काण्ड  »  सर्ग 71: कबन्ध की आत्मकथा, अपने शरीर का दाह हो जाने पर उसका श्रीराम को सीता के अन्वेषण में सहायता देने का आश्वासन  »  श्लोक 2-3h
 
 
श्लोक  3.71.2-3h 
यथा सूर्यस्य सोमस्य शक्रस्य च यथा वपु:।
सोऽहं रूपमिदं कृत्वा लोकवित्रासनं महत्॥ २॥
ऋषीन् वनगतान् राम त्रासयामि ततस्तत:।
 
 
अनुवाद
मेरा शरीर सूर्य, चन्द्रमा और इन्द्र के शरीर के समान तेजस्वी था। फिर भी मैं इस अत्यन्त भयानक राक्षस रूप में घूम-घूमकर लोगों को भयभीत करता था और वन में रहने वाले ऋषियों को डराता था॥ 2 1/2॥
 
My body was as radiant as the body of the Sun, Moon and Indra. Despite this, I used to roam around in this extremely terrifying demon form, frightening people and scaring the sages living in the forest.॥ 2 1/2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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