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श्लोक 3.71.16-17h  |
अनेन वपुषा तात वनेऽस्मिन् राजसत्तम॥ १६॥
यद् यत् पश्यामि सर्वस्य ग्रहणं साधु रोचये। |
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| अनुवाद |
| ‘पिताजी! हे राजन! इस शरीर से इस वन में जो कुछ भी मैं देखूँ, उसे ग्रहण करूँ।॥16 1/2॥ |
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| ‘Father! O King! Whatever I see in this forest with this body, I should accept it.॥ 16 1/2॥ |
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