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ramayan 3.68.25: हे सौम्य! हे शत्रुओं को पीड़ा देने वाले लक्ष्मण! इस समय मैं सीता के हरण से उतना दुःखी नहीं हूँ, जितना कि मेरे लिए प्राण त्यागने वाले जटायु के मरण से हूँ॥ 25॥   |   ramayan सर्ग 3.68: जटायु का प्राण-त्याग और श्रीराम द्वारा उनका दाह-संस्कार   ।   ramayan काण्ड 3: अरण्य काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 3: अरण्य काण्ड  »  सर्ग 68: जटायु का प्राण-त्याग और श्रीराम द्वारा उनका दाह-संस्कार  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  3.68.25 
सीताहरणजं दु:खं न मे सौम्य तथागतम्।
यथा विनाशो गृध्रस्य मत्कृते च परंतप॥ २५॥
 
 
अनुवाद
हे सौम्य! हे शत्रुओं को पीड़ा देने वाले लक्ष्मण! इस समय मैं सीता के हरण से उतना दुःखी नहीं हूँ, जितना कि मेरे लिए प्राण त्यागने वाले जटायु के मरण से हूँ॥ 25॥
 
Gentle one! O Lakshmana, who torments the enemies! At this moment I am not as saddened by the abduction of Sita as I am by the death of Jatayu, who sacrificed his life for me.॥ 25॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)