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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 3: अरण्य काण्ड  »  सर्ग 68: जटायु का प्राण-त्याग और श्रीराम द्वारा उनका दाह-संस्कार  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  3.68.2 
ममायं नूनमर्थेषु यतमानो विहंगम:।
राक्षसेन हत: संख्ये प्राणांस्त्यजति मत्कृते॥ २॥
 
 
अनुवाद
भैया! यह पक्षी मेरा काम पूरा करने की कोशिश ज़रूर कर रहा था, लेकिन उस राक्षस ने युद्ध में उसे मार डाला। यह मेरे लिए ही अपने प्राण त्याग रहा है।
 
Brother! This bird was definitely trying to accomplish my task, but was killed in the battle by that demon. It is sacrificing its life for me only.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)