श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 3: अरण्य काण्ड  »  सर्ग 67: श्रीराम और लक्ष्मण की पक्षिराज जटायु से भेंट तथा श्रीराम का उन्हें गले से लगाकर रोना  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  3.67.5 
राक्षसैर्बहुभि: कीर्णं नानाद्रुमलतायुतम्।
सन्तीह गिरिदुर्गाणि निर्दरा: कन्दराणि च॥ ५॥
 
 
अनुवाद
नाना प्रकार के वृक्षों और लताओं से युक्त यह घना वन अनेक राक्षसों से भरा हुआ है। पर्वत शिखर पर अनेक दुर्गम स्थान, टूटी हुई चट्टानें और गुफाएँ हैं।॥5॥
 
‘This dense forest with various kinds of trees and creepers is filled with many demons. There are many inaccessible places, broken rocks and caves on the mountain top.॥ 5॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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