श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 3: अरण्य काण्ड  »  सर्ग 67: श्रीराम और लक्ष्मण की पक्षिराज जटायु से भेंट तथा श्रीराम का उन्हें गले से लगाकर रोना  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  3.67.28 
इत्येवमुक्त्वा बहुशो राघव: सहलक्ष्मण:।
जटायुषं च पस्पर्श पितृस्नेहं निदर्शयन्॥ २८॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार बहुत सी बातें कहकर श्री रघुनाथजी ने लक्ष्मण सहित जटायु के शरीर को सहलाया और उस पर पिता के समान स्नेह प्रकट किया॥ 28॥
 
Having said many things in this manner, Sri Raghunatha along with Lakshmana caressed Jatayu's body and showed the same affection towards him as one should have for a father.॥ 28॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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