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श्लोक 3.67.26  |
नास्त्यभाग्यतरो लोके मत्तोऽस्मिन् स चराचरे।
येनेयं महती प्राप्ता मया व्यसनवागुरा॥ २६॥ |
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| अनुवाद |
| इस संसार में मुझसे बढ़कर कोई अभागा नहीं है, जिसके दुर्भाग्य के कारण मैं इस विपत्ति रूपी विशाल जाल में फँस गया हूँ॥ 26॥ |
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| In this world there is no one more unfortunate than me, because of whose misfortune I have been caught in this huge net of adversity.॥ 26॥ |
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