श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 3: अरण्य काण्ड  »  सर्ग 67: श्रीराम और लक्ष्मण की पक्षिराज जटायु से भेंट तथा श्रीराम का उन्हें गले से लगाकर रोना  »  श्लोक 24
 
 
श्लोक  3.67.24 
राज्यं भ्रष्टं वने वास: सीता नष्टा मृतो द्विज:।
ईदृशीयं ममालक्ष्मीर्दहेदपि हि पावकम्॥ २४॥
 
 
अनुवाद
लक्ष्मण! मेरा राज्य छीन लिया गया, मुझे वनवास हो गया (मेरे पिता मर गए), सीता का अपहरण हो गया और मेरा परम सहायक पक्षीराज भी मर गया। मेरा यह दुर्भाग्य ऐसा है कि अग्नि को भी जलाकर भस्म कर सकता है॥ 24॥
 
Lakshmana! My kingdom was snatched away, I was exiled (my father died), Sita was kidnapped and my best helper, the king of birds, also died. This misfortune of mine is such that it can burn even the fire to ashes.॥ 24॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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