श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 3: अरण्य काण्ड  »  सर्ग 67: श्रीराम और लक्ष्मण की पक्षिराज जटायु से भेंट तथा श्रीराम का उन्हें गले से लगाकर रोना  »  श्लोक 21-22
 
 
श्लोक  3.67.21-22 
रामस्तस्य तु विज्ञाय सीतासक्तां प्रियां कथाम्।
गृध्रराजं परिष्वज्य परित्यज्य महद् धनु:॥ २१॥
निपपातावशो भूमौ रुरोद सहलक्ष्मण:।
द्विगुणीकृततापार्तो रामो धीरतरोऽपि सन्॥ २२॥
 
 
अनुवाद
सीता के विषय में यह मधुर वार्तालाप सुनकर श्री राम ने अपना महान धनुष फेंक दिया और गिद्धराज जटायु को हृदय से लगाकर शोक से व्याकुल होकर भूमि पर गिर पड़े और लक्ष्मण सहित विलाप करने लगे। अत्यन्त धैर्यवान होने पर भी श्री राम को उस समय दुगुना दुःख हुआ।
 
Hearing this sweet conversation about Sita, Shri Rama threw away his great bow and embracing the vulture king Jatayu, he fell on the ground overcome with grief and started crying along with Lakshmana. Despite being very patient, Shri Rama felt double the sorrow at that time. 21-22.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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