श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 3: अरण्य काण्ड  »  सर्ग 67: श्रीराम और लक्ष्मण की पक्षिराज जटायु से भेंट तथा श्रीराम का उन्हें गले से लगाकर रोना  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  3.67.2 
स निगृह्य महाबाहु: प्रवृद्धं रोषमात्मन:।
अवष्टभ्य धनुश्चित्रं रामो लक्ष्मणमब्रवीत्॥ २॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात् महाबाहु श्री रामजी ने अपने बढ़ते हुए क्रोध को नियंत्रित करके उस विचित्र धनुष को उतार दिया और लक्ष्मण से कहा - ॥2॥
 
Thereafter the mighty-armed Sri Rama controlled his rising anger, took off that strange bow and said to Lakshmana - ॥2॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas