श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 3: अरण्य काण्ड  »  सर्ग 67: श्रीराम और लक्ष्मण की पक्षिराज जटायु से भेंट तथा श्रीराम का उन्हें गले से लगाकर रोना  »  श्लोक 19-20
 
 
श्लोक  3.67.19-20 
अयं तु सारथिस्तस्य मत्पक्षनिहतो भुवि।
परिश्रान्तस्य मे पक्षौ छित्त्वा खड्गेन रावण:॥ १९॥
सीतामादाय वैदेहीमुत्पपात विहायसम्।
रक्षसा निहतं पूर्वं मां न हन्तुं त्वमर्हसि॥ २०॥
 
 
अनुवाद
‘यह रावण का सारथि है, जिसे मैंने अपने पंखों से मार डाला था। जब मैं युद्ध करते-करते थक गया, तब रावण ने अपनी तलवार से मेरे दोनों पंख काट डाले और वह विदेह राजकुमारी सीता को लेकर आकाश में उड़ गया। मैं उस राक्षस के द्वारा पहले ही मारा जा चुका हूँ, अब तुम मुझे मत मारो।’॥19-20॥
 
‘This is Ravana's charioteer, whom I killed with my wings. When I got tired of fighting, Ravana cut off both my wings with his sword and he flew into the sky with Videha princess Sita. I have already been killed by that demon, now you do not kill me.'॥ 19-20॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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