श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 3: अरण्य काण्ड  »  सर्ग 67: श्रीराम और लक्ष्मण की पक्षिराज जटायु से भेंट तथा श्रीराम का उन्हें गले से लगाकर रोना  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  3.67.17 
सीतामभ्यवपन्नोऽहं रावणश्च रणे प्रभो।
विध्वंसितरथच्छत्र: पतितो धरणीतले॥ १७॥
 
 
अनुवाद
प्रभु! यह देखते ही मैं सीता की सहायता के लिए दौड़ा। मैंने रावण से युद्ध किया। उस युद्ध में मैंने रावण का रथ, छत्र आदि सब सामान नष्ट कर दिया और वह भी घायल होकर पृथ्वी पर गिर पड़ा॥17॥
 
Lord! As soon as I saw it, I ran to help Sita. I fought with Ravana. In that war I destroyed all the things of Ravana like his chariot and umbrella etc. and he too got injured and fell on the earth.॥ 17॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas