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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 3: अरण्य काण्ड  »  सर्ग 64: श्रीराम और लक्ष्मण के द्वारा सीता की खोज, आभूषणों के कण और युद्ध के चिह्न देखकर श्रीराम का देवता आदि सहित समस्त त्रिलोकी पर रोष प्रकट करना  »  श्लोक 21-23h
 
 
श्लोक  3.64.21-23h 
उवाच लक्ष्मणो धीमान् ज्येष्ठं भ्रातरमार्तवत्।
क्व सीतेति त्वया पृष्टा यथेमे सहसोत्थिता:॥ २१॥
दर्शयन्ति क्षितिं चैव दक्षिणां च दिशं मृगा:।
साधु गच्छावहे देव दिशमेतां च नैर्ऋतीम्॥ २२॥
यदि तस्यागम: कश्चिदार्या वा साथ लक्ष्यते।
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात्, बुद्धिमान लक्ष्मण ने व्यथित होकर अपने बड़े भाई से इस प्रकार कहा, 'आर्य! जब आपने पूछा कि सीता कहाँ हैं, तो ये मृग सहसा उठ खड़े हुए और हमें पृथ्वी तथा दक्षिण दिशा की ओर संकेत करने लगे; अतः हे देव! अच्छा होगा कि हम इसी दक्षिण-पश्चिम दिशा की ओर चलें। सम्भव है कि इस ओर जाने से हमें सीता का कोई समाचार मिल जाए अथवा आर्य सीता स्वयं ही दृष्टिगोचर हो जाएँ।'
 
Thereafter, the wise Lakshmana, in a distressed state, addressed his elder brother thus, 'Arya! When you asked where Sita was, these deer suddenly stood up and started pointing us towards the earth and the south; therefore, O God! It would be better if we proceed towards this south-west direction. It is possible that by going this way we may get some news of Sita or Arya Sita herself may come into sight.'
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)