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ramayan 3.63.5: पहले मैं राज्य से वंचित हुआ, फिर अपने बन्धु-बान्धवों से वियोग हुआ। तत्पश्चात् मेरे पिता का देहान्त हो गया, फिर मुझे अपनी माता से भी वियोग होना पड़ा। लक्ष्मण! जब मैं इन सब बातों का स्मरण करता हूँ, तब मेरे शोक की तीव्रता बढ़ जाती है॥5॥   |   ramayan सर्ग 3.63: श्रीराम का विलाप   ।   ramayan काण्ड 3: अरण्य काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 3: अरण्य काण्ड  »  सर्ग 63: श्रीराम का विलाप  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  3.63.5 
राज्यप्रणाश: स्वजनैर्वियोग:
पितुर्विनाशो जननीवियोग:।
सर्वाणि मे लक्ष्मण शोकवेग-
मापूरयन्ति प्रविचिन्तितानि॥ ५॥
 
 
अनुवाद
पहले मैं राज्य से वंचित हुआ, फिर अपने बन्धु-बान्धवों से वियोग हुआ। तत्पश्चात् मेरे पिता का देहान्त हो गया, फिर मुझे अपनी माता से भी वियोग होना पड़ा। लक्ष्मण! जब मैं इन सब बातों का स्मरण करता हूँ, तब मेरे शोक की तीव्रता बढ़ जाती है॥5॥
 
‘First I was deprived of the kingdom; then I was separated from my relatives. After that my father died, then I had to be separated from my mother also. Lakshman! When I remember all these things, then the intensity of my grief increases.॥ 5॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)