श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 3: अरण्य काण्ड  »  सर्ग 61: श्रीराम और लक्ष्मण के द्वारा सीता की खोज और उनके न मिलने से श्रीराम की व्याकुलता  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  3.61.5 
यै: परिक्रीडसे सीते विश्वस्तैर्मृगपोतकै:।
एते हीनास्त्वया सौम्ये ध्यायन्त्यस्राविलेक्षणा:॥ ५॥
 
 
अनुवाद
'हे कोमल स्वभाव वाली सीता! जिन विश्वासपात्र मृग-शावकों के साथ तुम खेला करती थीं, वे आज तुम्हारे बिना दुःखी हैं और उनकी आँखों में आँसू आ गए हैं।'
 
'Gentle natured Sita! The trusted deer cubs with whom you used to play are today sad without you and have become worried with tears in their eyes.'
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)