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श्लोक  3.61.29 
बहुश: स तु नि:श्वस्य रामो राजीवलोचन:।
हा प्रियेति विचुक्रोश बहुशो बाष्पगद‍्गद:॥ २९॥
 
 
अनुवाद
कमल-नेत्र श्री रामजी बार-बार आह भरते हुए, आँसुओं से रुँधे हुए स्वर में 'हे मेरे प्रियतम!' कहकर बहुत विलाप करने लगे।
 
Sighing repeatedly, the lotus-eyed Sri Rama began to weep and lament a lot, saying, 'Oh my beloved!' in a voice choked with tears.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)