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श्लोक 3.60.38  |
तदा स गत्वा विपुलं महद् वनं
परीत्य सर्वं त्वथ मैथिलीं प्रति।
अनिष्ठिताश: स चकार मार्गणे
पुन: प्रियाया: परमं परिश्रमम्॥ ३८॥ |
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| अनुवाद |
| उस समय वे मिथिलेशकुमारी की खोज करते हुए उस विशाल एवं विस्तृत वन में गए और सब ओर घूमकर थक गए, परन्तु निराश नहीं हुए। उन्होंने पुनः अपनी प्रियतमा की खोज के लिए महान प्रयत्न किए॥38॥ |
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| At that time, in search of Mithilesh Kumari, he went to that vast and wide forest and after roaming around everywhere he got tired, but he did not feel dejected. He again made great efforts to search for his beloved. ॥ 38॥ |
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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे षष्टितम: सर्ग: ॥ ६ ०॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें साठवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ६ ०॥ |
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