श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 3: अरण्य काण्ड  »  सर्ग 60: श्रीराम का विलाप करते हुए वृक्षों और पशुओं से सीता का पता पूछना, भ्रान्त होकर रोना और बारंबार उनकी खोज करना  »  श्लोक 35-36
 
 
श्लोक  3.60.35-36 
हा लक्ष्मण महाबाहो पश्यसे त्वं प्रियां क्वचित्।
हा प्रिये क्व गता भद्रे हा सीतेति पुन: पुन:॥ ३५॥
इत्येवं विलपन् राम: परिधावन् वनाद् वनम्।
क्वचिदुद‍्भ्रमते वेगात् क्वचिद् विभ्रमते बलात्॥ ३६॥
 
 
अनुवाद
'हे महाबाहु लक्ष्मण! क्या तुम मेरी प्रियतमा को कहीं देखते हो? हाँ प्रिये! हा भद्रे! हा सीते! तुम कहाँ चले गए?' इस प्रकार बार-बार विलाप करते हुए श्री रामचंद्रजी एक वन से दूसरे वन में दौड़ने लगे। कहीं वे सीता के सदृश रूप को देखकर हर्षित (उछलते) हो जाते और कहीं शोक की तीव्रता के कारण विचलित हो जाते (बवंडर के समान घूमने लगते)॥35-36॥
 
'Oh great-armed Lakshman! Do you see my beloved anywhere? Yes dear! Ha Bhadre! Ha Site! Where have you gone?' Moaning like this again and again, Shri Ramchandraji started running from one forest to another. At some places, they would get excited (jump) after seeing the likeness of Sita and at other places, due to the intensity of grief, they would become disoriented (start spinning like a whirlwind). 35-36॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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