श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 3: अरण्य काण्ड  »  सर्ग 60: श्रीराम का विलाप करते हुए वृक्षों और पशुओं से सीता का पता पूछना, भ्रान्त होकर रोना और बारंबार उनकी खोज करना  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  3.60.33 
नूनं विक्षिप्यमाणौ तौ बाहू पल्लवकोमलौ।
भक्षितौ वेपमानाग्रौ सहस्ताभरणाङ्गदौ॥ ३३॥
 
 
अनुवाद
वे नये पत्तों के समान कोमल भुजाएँ, जो इधर-उधर हिल रही होंगी और जिनकी अग्रभुजाएँ काँप रही होंगी, वे हाथों और बाजूबंदों के आभूषणों सहित, निश्चय ही राक्षसों के पेट में चली गईं॥33॥
 
'Those arms, as soft as new leaves, which must have been thrashing here and there and whose forearms must have been trembling, along with the ornaments on the hands and the armlets, surely went into the stomachs of the demons.॥ 33॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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