श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 3: अरण्य काण्ड  »  सर्ग 60: श्रीराम का विलाप करते हुए वृक्षों और पशुओं से सीता का पता पूछना, भ्रान्त होकर रोना और बारंबार उनकी खोज करना  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  3.60.32 
सा हि चम्पकवर्णाभा ग्रीवा ग्रैवेयकोचिता।
कोमला विलपन्त्यास्तु कान्ताया भक्षिता शुभा॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
चम्पा के समान कोमल और हार आदि आभूषणों के पहनने योग्य, प्रिय सीता की रोती हुई और विलाप करती हुई गर्दन रात्रिचर प्राणियों का आहार बन गई॥ 32॥
 
'The weeping and wailing neck of Sita, her beloved, with a complexion as soft as Champa and suitable for wearing necklaces and other ornaments, became food for the night creatures.॥ 32॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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