श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 3: अरण्य काण्ड  »  सर्ग 60: श्रीराम का विलाप करते हुए वृक्षों और पशुओं से सीता का पता पूछना, भ्रान्त होकर रोना और बारंबार उनकी खोज करना  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  3.60.17 
अशोक शोकापनुद शोकोपहतचेतनम्।
त्वन्नामानं कुरु क्षिप्रं प्रियासंदर्शनेन माम्॥ १७॥
 
 
अनुवाद
‘अशोक! आप दुःख को दूर करने वाले हैं। मैं दुःख के कारण अपनी सुध-बुध खो बैठा हूँ। मुझे मेरे प्रियतम का दर्शन कराइए और मुझे शीघ्र ही अपने समान बना दीजिए – मुझे अशोक (दुःख से मुक्त) कर दीजिए॥ 17॥
 
‘Ashok! You are the one who removes sorrow. I have lost my senses due to sorrow. Make me see my beloved and make me soon like you – make me Ashok (free from sorrow).॥ 17॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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