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श्लोक 3.59.4  |
स्फुरते नयनं सव्यं बाहुश्च हृदयं च मे।
दृष्ट्वा लक्ष्मण दूरे त्वां सीताविरहितं पथि॥ ४॥ |
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| अनुवाद |
| 'लक्ष्मण! मेरी बाईं आँख और बाएँ हाथ फड़क रहे हैं। तुम्हें सीता के बिना आश्रम से जाते देख मेरा हृदय धड़क रहा है।'॥4॥ |
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| ‘Lakshman! My left eye and left arm are throbbing. My heart is pounding as I see you coming away from the ashram without Sita.'॥ 4॥ |
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