श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 3: अरण्य काण्ड  »  सर्ग 57: श्रीराम का लौटना, मार्ग में अपशकुन देखकर चिन्तित होना तथा लक्ष्मण से सीता पर सङ्कट आने की आशङ्का करना  »  श्लोक 18-19h
 
 
श्लोक  3.57.18-19h 
न मेऽस्ति संशयो वीर सर्वथा जनकात्मजा॥ १८॥
विनष्टा भक्षिता वापि राक्षसैर्वनचारिभि:।
 
 
अनुवाद
'वीर! मुझे इसमें कोई संदेह नहीं है कि वन में विचरण करने वाले राक्षस जनकपुत्री सीता का या तो पूर्णतः नाश कर देते अथवा उन्हें खा जाते।
 
'Valiant! I have no doubt that the demons roaming in the forest would have either completely destroyed Janaka's daughter Sita or they would have eaten her.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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