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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 3: अरण्य काण्ड  »  सर्ग 56: सीता का श्रीराम के प्रति अपना अनन्य अनुराग दिखाकर रावण को फटकारना तथा रावण की आज्ञा से राक्षसियों का उन्हें अशोकवाटिका में ले जाकर डराना  »  श्लोक 22-23h
 
 
श्लोक  3.56.22-23h 
न तु शक्यमपक्रोशं पृथिव्यां दातुमात्मन:।
एवमुक्त्वा तु वैदेही क्रोधात् सुपरुषं वच:॥ २२॥
रावणं जानकी तत्र पुनर्नोवाच किंचन।
 
 
अनुवाद
"मैं इस पृथ्वी पर ऐसा कुछ भी नहीं कर सकती जिससे मुझे कलंक या कलंक लगे।" रावण से क्रोधपूर्वक ये कठोर वचन कहकर विदेह राजकुमारी जानकी चुप हो गईं, उसके बाद उन्होंने कुछ नहीं कहा।
 
"I cannot do anything on this earth that would bring disgrace or stigma upon myself." Having spoken these harsh words to Ravana in anger, Videha princess Janaki became quiet; she did not speak anything thereafter.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)