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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 3: अरण्य काण्ड  »  सर्ग 54: सीता का पाँच वानरों के बीच अपने भूषण और वस्त्र को गिराना, रावण का सीता को अन्तःपुर में रखना  »  श्लोक 7-8h
 
 
श्लोक  3.54.7-8h 
वनानि सरित: शैलान् सरांसि च विहायसा॥ ७॥
स क्षिप्रं समतीयाय शरश्चापादिव च्युत:।
 
 
अनुवाद
धनुष से छूटे हुए बाण के समान तीव्र गति से चलते हुए, वह आकाश में अनेक वनों, नदियों, पर्वतों और झीलों को तुरन्त पार कर गया। 7 1/2
 
Moving at a speed like an arrow shot from a bow, he instantly crossed numerous forests, rivers, mountains and lakes through the sky. 7 1/2
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)