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ramayan 3.50.11: 'राक्षसराज! जब आपका स्वभाव इतना पापमय है और आप इतने चंचल हैं, तो फिर आपको पापी देवताओं के विमान के समान यह ऐश्वर्य कैसे प्राप्त हुआ?   |   ramayan सर्ग 3.50: जटायु का रावण को सीताहरण के दुष्कर्म से निवृत्त होने के लिये समझाना और अन्त में युद्ध के लिये ललकारना   ।   ramayan काण्ड 3: अरण्य काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 3: अरण्य काण्ड  »  सर्ग 50: जटायु का रावण को सीताहरण के दुष्कर्म से निवृत्त होने के लिये समझाना और अन्त में युद्ध के लिये ललकारना  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  3.50.11 
पापस्वभावश्चपल: कथं त्वं रक्षसां वर।
ऐश्वर्यमभिसम्प्राप्तो विमानमिव दुष्कृती॥ ११॥
 
 
अनुवाद
'राक्षसराज! जब आपका स्वभाव इतना पापमय है और आप इतने चंचल हैं, तो फिर आपको पापी देवताओं के विमान के समान यह ऐश्वर्य कैसे प्राप्त हुआ?
 
'King of demons! When your nature is so sinful and you are so fickle, then how did you get this opulence like the plane of a sinner's gods?
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)