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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 3: अरण्य काण्ड  »  सर्ग 48: रावण के द्वारा अपने पराक्रम का वर्णन और सीता द्वारा उसको कड़ी फटकार  »  श्लोक 3-4
 
 
श्लोक  3.48.3-4 
यस्य देवा: सगन्धर्वा: पिशाचपतगोरगा:।
विद्रवन्ति सदा भीता मृत्योरिव सदा प्रजा:॥ ३॥
येन वैश्रवणो भ्राता वैमात्रा: कारणान्तरे।
द्वन्द्वमासादित: क्रोधाद् रणे विक्रम्य निर्जित:॥ ४॥
 
 
अनुवाद
'जिस प्रकार मनुष्य मृत्यु से सदैव भयभीत रहते हैं, उसी प्रकार देवता, गंधर्व, भूत, पक्षी और नाग भी उसी से सदैव भयभीत रहते हैं जिससे वे दूर भागते हैं। मैं ही वह हूँ जिसने किसी कारणवश अपने सौतेले भाई कुबेर के साथ द्वन्द्वयुद्ध किया था और अपने पराक्रम और क्रोध से उसे युद्धभूमि में परास्त किया था।
 
'Just as humans are always afraid of death, similarly the gods, Gandharvas, ghosts, birds and serpents are always afraid of the one from whom they run away. I am the one who for some reason fought a duel with his step brother Kubera and defeated him in the battle field with my valour and anger.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)