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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 3: अरण्य काण्ड  »  सर्ग 48: रावण के द्वारा अपने पराक्रम का वर्णन और सीता द्वारा उसको कड़ी फटकार  »  श्लोक 15-16
 
 
श्लोक  3.48.15-16 
स्थापयित्वा प्रियं पुत्रं राज्ये दशरथो नृप:।
मन्दवीर्यस्ततो ज्येष्ठ: सुत: प्रस्थापितो वनम्॥ १५॥
तेन किं भ्रष्टराज्येन रामेण गतचेतसा।
करिष्यसि विशालाक्षि तापसेन तपस्विना॥ १६॥
 
 
अनुवाद
'विशालोचने! जो राज्य से भ्रष्ट हो गए हैं, बुद्धिहीन हैं और तपस्या में लगे हुए हैं, जिन्हें राजा दशरथ ने अपने प्रिय पुत्र को राजा बनाकर वन में भेज दिया है, उन तपस्वी राम को तुम क्या करोगे?॥15-16॥
 
'Vishallochane! What will you do with that ascetic Ram, who has been corrupted by the kingdom, lacking in wisdom and is engaged in penance, whom King Dasharath had sent to the forest while making his beloved son the king?॥ 15-16॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)