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ramayan 3.42.32-33h: वह वहाँ फूल चुनती हुई घूमने लगी। उसका मुख अत्यंत सुंदर था। वह वनवास का कष्ट सहने के योग्य नहीं थी। परम सुंदरी सीता ने उस रत्नजटित मृग को देखा, जिसका प्रत्येक अंग मोतियों से जड़ा हुआ प्रतीत हो रहा था।   |   ramayan सर्ग 3.42: मारीच का सुवर्णमय मृगरूप धारण करके श्रीराम के आश्रम पर जाना और सीता का उसे देखना   ।   ramayan काण्ड 3: अरण्य काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 3: अरण्य काण्ड  »  सर्ग 42: मारीच का सुवर्णमय मृगरूप धारण करके श्रीराम के आश्रम पर जाना और सीता का उसे देखना  »  श्लोक 32-33h
 
 
श्लोक  3.42.32-33h 
कुसुमान्यपचिन्वन्ती चचार रुचिरानना।
अनर्हा वनवासस्य सा तं रत्नमयं मृगम्॥ ३२॥
मुक्तामणिविचित्राङ्गं ददर्श परमाङ्गना।
 
 
अनुवाद
वह वहाँ फूल चुनती हुई घूमने लगी। उसका मुख अत्यंत सुंदर था। वह वनवास का कष्ट सहने के योग्य नहीं थी। परम सुंदरी सीता ने उस रत्नजटित मृग को देखा, जिसका प्रत्येक अंग मोतियों से जड़ा हुआ प्रतीत हो रहा था।
 
She started roaming around there, picking flowers. Her face was very beautiful. She was not fit to suffer the pain of exile. The most beautiful Sita saw that gem-studded deer, whose every limb appeared to be painted with pearls.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)