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ramayan 3.42.29-30h: यद्यपि राक्षस मारीच मृगों को मारने के लिए सदैव तत्पर रहता था, तथापि उस समय उसने अपने मनोभावों को छिपाने के लिए उन जंगली मृगों को छूकर भी नहीं खाया। 29 1/2॥   |   ramayan सर्ग 3.42: मारीच का सुवर्णमय मृगरूप धारण करके श्रीराम के आश्रम पर जाना और सीता का उसे देखना   ।   ramayan काण्ड 3: अरण्य काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 3: अरण्य काण्ड  »  सर्ग 42: मारीच का सुवर्णमय मृगरूप धारण करके श्रीराम के आश्रम पर जाना और सीता का उसे देखना  »  श्लोक 29-30h
 
 
श्लोक  3.42.29-30h 
राक्षस: सोऽपि तान् वन्यान् मृगान् मृगवधे रत:॥ २९॥
प्रच्छादनार्थं भावस्य न भक्षयति संस्पृशन्।
 
 
अनुवाद
यद्यपि राक्षस मारीच मृगों को मारने के लिए सदैव तत्पर रहता था, तथापि उस समय उसने अपने मनोभावों को छिपाने के लिए उन जंगली मृगों को छूकर भी नहीं खाया। 29 1/2॥
 
Even though the demon Marich was always ready to kill the deer, at that time, to hide his feelings, he did not even touch those wild deer and eat them. 29 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)