श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 3: अरण्य काण्ड  »  सर्ग 39: मारीच का रावण को समझाना  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  3.39.4 
अग्निहोत्रेषु तीर्थेषु चैत्यवृक्षेषु रावण।
अत्यन्तघोरो व्यचरंस्तापसांस्तान् प्रधर्षयन्॥ ४॥
 
 
अनुवाद
'रावण! मैं अत्यन्त भयंकर रूप धारण करके अग्निकुण्डों में, जलाशयों के तट पर तथा दिव्य वृक्षों के नीचे बैठे हुए तपस्वियों का तिरस्कार करता हुआ सर्वत्र विचरण करने लगा।
 
'Ravana! Having assumed a very fearsome form, I started roaming everywhere, despising the ascetics sitting in the fire halls, on the banks of water reservoirs and under the divine trees.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)