'तुम मेरे मित्र हो। मैं यह सब तुम्हारा हित करने के उद्देश्य से कह रहा हूँ। यदि तुम नहीं मानोगे, तो आज युद्ध में राम के सीधे बाणों से घायल होकर तुम्हें अपने बन्धु-बान्धवों सहित प्राण त्यागने पड़ेंगे।'॥ 25॥
'You are my friend. I am saying all this with the intention of doing good to you. If you do not listen, then you will have to give up your life along with your friends and relatives by getting injured by the straight arrows of Rama in the war today.'॥ 25॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे एकोनचत्वारिंश: सर्ग: ॥ ३ ९॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें उनतालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ३ ९॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)