| श्रीमद् वाल्मीकि रामायण » काण्ड 3: अरण्य काण्ड » सर्ग 38: श्रीराम की शक्ति के विषय में अपना अनुभव बताकर मारीच का रावण को उनका अपराध करने से मना करना » श्लोक 30-31 |
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| | | | श्लोक 3.38.30-31  | परदाराभिमर्शात् तु नान्यत् पापतरं महत्।
प्रमदानां सहस्राणि तव राजन् परिग्रहे॥ ३०॥
भव स्वदारनिरत: स्वकुलं रक्ष राक्षसान्।
मानं वृद्धिं च राज्यं च जीवितं चेष्टमात्मन:॥ ३१॥ | | | | | | अनुवाद | | 'राजन्! परस्त्री-संग से बड़ा कोई पाप नहीं है। तुम्हारे अन्तःपुर में हजारों युवतियाँ हैं, उन्हीं स्त्रियों से प्रेम करो। अपने कुल की रक्षा करो, राक्षसों के प्राण बचाओ और अपने मान, प्रतिष्ठा, उन्नति, राज्य और प्रिय प्राण को नष्ट न होने दो।॥ 30-31॥ | | | | ‘King! There is no greater sin than the company of another's wife. There are thousands of young women in your inner palace, love those women of your own. Protect your clan, save the lives of the demons and do not let your honour, prestige, progress, kingdom and dear life be destroyed.॥ 30-31॥ | | ✨ ai-generated | | |
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