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श्लोक  3.35.2-3 
तत् कार्यमनुगम्यान्तर्यथावदुपलभ्य च।
दोषाणां च गुणानां च सम्प्रधार्य बलाबलम्॥ २॥
इति कर्तव्यमित्येव कृत्वा निश्चयमात्मन:।
स्थिरबुद्धिस्ततो रम्यां यानशालां जगाम ह॥ ३॥
 
 
अनुवाद
पहले उसने सीता के हरण के कार्य के बारे में सोचा। फिर उसके गुणों और दोषों का पूर्ण ज्ञान प्राप्त करने के बाद, उसने उसे करने का निश्चय किया। अंततः उसने निश्चय किया कि यह कार्य अवश्य करना चाहिए। जब ​​उसका मन इस विषय में स्थिर हो गया, तब वह सुंदर रथ भवन में गया।
 
First he thought about the task of kidnapping Sita. Then after getting the complete knowledge of her flaws and virtues, he decided to do it. Finally he decided that this task must be done. When his mind was settled on this matter, then he went to the beautiful chariot house. 2-3.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)