श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 3: अरण्य काण्ड  »  सर्ग 32: शूर्पणखा का लंका में रावण के पास जाना  »  श्लोक 15-16h
 
 
श्लोक  3.32.15-16h 
वनं चैत्ररथं दिव्यं नलिनीं नन्दनं वनम्॥ १५॥
विनाशयति य: क्रोधाद् देवोद्यानानि वीर्यवान्।
 
 
अनुवाद
वह महाबली रात्रिचर योद्धा कुबेर के दिव्य चैत्ररथ वन, सुगन्धित कमलों से युक्त नलिनी नामक पुष्करिणी, इन्द्र के नन्दन वन तथा देवताओं के अन्य उद्यानों को क्रोधपूर्वक नष्ट कर देता था। 15 1/2॥
 
That mighty nocturnal warrior used to angrily destroy the divine Chaitrarath forest of Kuber, the Pushkarini named Nalini with fragrant lotuses, the Nandana forest of Indra and other gardens of the gods. 15 1/2॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas