श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 3: अरण्य काण्ड  »  सर्ग 31: रावण का अकम्पन की सलाह से सीता का अपहरण करने के लिये जाना और मारीच के कहने से लङ्का को लौट आना  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  3.31.6 
कालस्य चाप्यहं कालो दहेयमपि पावकम्।
मृत्युं मरणधर्मेण संयोजयितुमुत्सहे॥ ६॥
 
 
अनुवाद
'मैं मृत्यु का भी काल हूँ; मैं अग्नि को जला सकता हूँ और मृत्यु को भी मृत्यु के मुँह में डाल सकता हूँ।॥6॥
 
'I am the death of death; I can burn the fire and can even put death into the mouth of death.॥ 6॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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