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श्लोक 3.31.5  |
न हि मे विप्रियं कृत्वा शक्यं मघवता सुखम्।
प्राप्तुं वैश्रवणेनापि न यमेन च विष्णुना॥ ५॥ |
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| अनुवाद |
| मेरे प्रति अपराध करने पर इन्द्र, यम, कुबेर और विष्णु भी शान्त नहीं रह सकेंगे।॥5॥ |
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| ‘Even Indra, Yama, Kubera and Vishnu will not be able to remain in peace after committing an offence against me. ॥ 5॥ |
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