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श्लोक 3.31.26  |
संहृत्य वा पुनर्लोकान् विक्रमेण महायशा:।
शक्त: श्रेष्ठ: स पुरुष: स्रष्टुं पुनरपि प्रजा:॥ २६॥ |
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| अनुवाद |
| वह परम तेजस्वी पुरुष अपने पराक्रम से सम्पूर्ण लोकों का नाश करके नये सिरे से मनुष्यों की सृष्टि करने में समर्थ है ॥26॥ |
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| ‘That most illustrious man, by his might, is capable of destroying all the worlds and creating people afresh. 26॥ |
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